प्रतिदिन समाचारों को पढ़ते -सुनते हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि व्यक्ति कितना संवेदनहीन होता जा रहा है और ये प्रक्रिया अनवरत चालू है | स्वास्थ्य की ही बात करें तो एक ही दिन में अनेक ख़बरें सुनाई और दिखाई देतीं हैं जैसे दूध में डिटर्जेंट ,सब्जियों-फलों में रसायनों का स्तेमाल, मिड डे मील निम्न स्तर का होना, दवाओं का नकली व्यापार और भी ऐसा कुछ जो हम सब जानते होंगे या सोच भी नहीं सकते होंगे | गरीबों और पिछड़ों के स्वास्थ्य और शिक्षा की बातें करने वालों को ये भी महसूस करना होगा कि दाल का फ्लेवर मिले पानी के साथ सब्ज़ी के स्थान पर चटनी परोसकर स्कूलों में विद्यार्थी नहीं बटोरे जा सकते | पानी में हाथ डालकर दाल खोजते इन बच्चों को आप उनके बराबर कैसे खड़ा कर पाएँगे जिनकी भूख से पहले ही भोजन की मेज सजी होती है | अक्सर खेलों के स्तर की चर्चा होती है, उसके लिए मिलने वाली सुविधाओं की बात होती है पर हम मिलावटी दूध, प्रदूषित फल सब्जियां खिलाकर आने वाली नस्ल को कैसे होनहार बना पाएँगे! देश और समाज के अनेक मुद्दों के अलावा विभिन्न टैक्सों में बंटे आम आदमी की संवेदनशीलता यदि कम हुई है, उसके रिश्तों में कटुता बढ़ी है तो कोई आश्चर्य नहीं, वैदिक काल से हम जानते हैं कि हमारा आहार-विहार हमारी सोच को प्रभावित करता है |