किसी को क्या ये
याद है कि हम पहली बार कब भ्रष्ट हुए थे, स्कूल में
दाखिले
के वक्त या बोर्ड की परीक्षाओं में या फिर प्रतियोगी परीक्षा के पेपर ख़रीदते समय,
चालान के डर से दी गई छोटी सी रिश्वत के साथ, रिश्तेदारों की जरूरत के समय बहाना
बनाते वक्त या ट्रेन और सिनेमा के टिकटों के साथ, गैस कनेक्शन में या फिर पासपोर्ट......
है कहीं अंत ? कोई भी वर्ग कोई भी विभाग अछूता नहीं, याद करिए कि आपके भ्रष्टता की
प्रथम पाठशाला क्या थी, जब ये दिनचर्या का हिस्सा बन जाती है तो घोटाले और
भ्रष्टाचार जन्म लेते हैं. जहरीले पेड़ों की टहनियां काटने से कुछ नहीं होगा जड़ों
को नष्ट करना होगा, जिसके लिए हर व्यक्ति को सोचना होगा, हर किसी को इसका बीजारोपण रोकना होगा !