Wednesday, January 8, 2014

Bhrashtachar

    किसी को क्या ये याद है कि हम पहली बार कब भ्रष्ट हुए थे, स्कूल में
दाखिले के वक्त या बोर्ड की परीक्षाओं में या फिर प्रतियोगी परीक्षा के पेपर ख़रीदते समय, चालान के डर से दी गई छोटी सी रिश्वत के साथ, रिश्तेदारों की जरूरत के समय बहाना बनाते वक्त या ट्रेन और सिनेमा के टिकटों के साथ, गैस कनेक्शन में या फिर पासपोर्ट...... है कहीं अंत ? कोई भी वर्ग कोई भी विभाग अछूता नहीं, याद करिए कि आपके भ्रष्टता की प्रथम पाठशाला क्या थी, जब ये दिनचर्या का हिस्सा बन जाती है तो घोटाले और भ्रष्टाचार जन्म लेते हैं. जहरीले पेड़ों की टहनियां काटने से कुछ नहीं होगा जड़ों को नष्ट करना होगा, जिसके लिए हर व्यक्ति को सोचना होगा, हर किसी को इसका बीजारोपण रोकना होगा !

Saturday, August 24, 2013

   

     लोग तेजी
से विकसित और आधुनिक हो रहे है, ऊर्जा और जुनून ऐसा कि उनके रास्ते में समय और परिवेश बाधक नहीं बनते, दूसरी तरफ प्रशासन व सुरक्षा तंत्र के आधुनिकीकरण और विकास की रफ्तार बहुत धीमी, फिर भला घटनाएँ कैसे कम होंगी ! दोनों रफ़तारों में सामंजस्य होना चाहिए। या तो व्यवस्था चेत जाए या फिर लोग सचेत हो जाए...  

Sunday, November 14, 2010

जब मै छोटी थी और अल्लाहाबाद के एक स्कूल में पढ़ रही थी। तब भी मेरे दोस्तों की संख्या कम थी, मेरे लिए दोस्ती का मतलब उनसे बातें कर लेने तक ही सीमित था किन्तु मेरे साथ पढ़ने वाली वर्षा के लिए दोस्ती वो वस्तु थी जिसे वह बांधकर रख लेना चाहती थी , खाने की छुट्टी में वह चाट के ठेले तक मुझे अक्सर ले ही जाती मुझे यह कभी अच्छा नहीं लगता था, कक्षा में हमारे बैठने कि जगहें अलग-अलग थी पर वो जब-तब मुझे अपने ही पास बैठाती उसके अपने प्रति उसके लगाव के कारण मै अधिक विरोध नहीं कर पाती थी, उसके बुलाने पर एक बार मै उसके घर भी गयी थी वहां उसका छोटा भाई भी मिला , मुझे वहां भी अच्छा नहीं लग रहा था । तीन-चार वर्षो के बाद मै दूसरे स्कूल में चली गयी, एक बार वो मेरी अनुपस्थिति में घर आकर माँ से मिल गयी थी पर मुझे उससे मिलने की कोई उत्सुकता नहीं थी । बीतते समय के साथ ही मेरे अंतर में उसकी छवि अमिट होती गयी, तमाम व्यस्तताओं के बीच भी मै उसके स्नेह को नहीं भूल सकी हूँ। अनेक चिर-परिचितों के चेहरों के बीच उसका चेहरा मै आज भी विस्मृत नहीं कर सकी हूँ।

Friday, October 29, 2010

प्रतिदिन समाचारों को पढ़ते -सुनते हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि व्यक्ति कितना संवेदनहीन होता जा रहा है और ये प्रक्रिया अनवरत चालू है | स्वास्थ्य की ही बात करें तो एक ही दिन में अनेक ख़बरें सुनाई और दिखाई देतीं हैं जैसे दूध में डिटर्जेंट ,सब्जियों-फलों में रसायनों का स्तेमाल, मिड डे मील निम्न स्तर का होना, दवाओं का नकली व्यापार और भी ऐसा कुछ जो हम सब जानते होंगे या सोच भी नहीं सकते होंगे | गरीबों और पिछड़ों के स्वास्थ्य और शिक्षा की बातें करने वालों को ये भी महसूस करना होगा कि दाल का फ्लेवर मिले पानी के साथ सब्ज़ी के स्थान पर चटनी परोसकर स्कूलों में विद्यार्थी नहीं बटोरे जा सकते | पानी में हाथ डालकर दाल खोजते इन बच्चों को आप उनके बराबर कैसे खड़ा कर पाएँगे जिनकी भूख से पहले ही भोजन की मेज सजी होती है | अक्सर खेलों के स्तर की चर्चा होती है, उसके लिए मिलने वाली सुविधाओं की बात होती है पर हम मिलावटी दूध, प्रदूषित फल सब्जियां खिलाकर आने वाली नस्ल को कैसे होनहार बना पाएँगे! देश और समाज के अनेक मुद्दों के अलावा विभिन्न टैक्सों में बंटे आम आदमी की संवेदनशीलता यदि कम हुई है, उसके रिश्तों में कटुता बढ़ी है तो कोई आश्चर्य नहीं, वैदिक काल से हम जानते हैं कि हमारा आहार-विहार हमारी सोच को प्रभावित करता है |

Monday, September 6, 2010

अनुभूति

पढ़ने के साथ ही मुझे लिखना भी अच्छा लगता रहा है | किंतु बहुत दिनों से मैंने कुछ खास नहीं लिखा, मेरे बहुत से विचार पन्नों ने सहेज कर रक्खे है और उससे भी ज्यादा कोरी कल्पनाओ तक सीमित रहे |ब्लॉग के जरिए दूसरों को पढ़ने और स्वयं के विचार व्यक्त करने का अवसर सुखद है |