जब मै छोटी थी और अल्लाहाबाद के एक स्कूल में पढ़ रही थी। तब भी मेरे दोस्तों की संख्या कम थी, मेरे लिए दोस्ती का मतलब उनसे बातें कर लेने तक ही सीमित था किन्तु मेरे साथ पढ़ने वाली वर्षा के लिए दोस्ती वो वस्तु थी जिसे वह बांधकर रख लेना चाहती थी , खाने की छुट्टी में वह चाट के ठेले तक मुझे अक्सर ले ही जाती मुझे यह कभी अच्छा नहीं लगता था, कक्षा में हमारे बैठने कि जगहें अलग-अलग थी पर वो जब-तब मुझे अपने ही पास बैठाती उसके अपने प्रति उसके लगाव के कारण मै अधिक विरोध नहीं कर पाती थी, उसके बुलाने पर एक बार मै उसके घर भी गयी थी वहां उसका छोटा भाई भी मिला , मुझे वहां भी अच्छा नहीं लग रहा था । तीन-चार वर्षो के बाद मै दूसरे स्कूल में चली गयी, एक बार वो मेरी अनुपस्थिति में घर आकर माँ से मिल गयी थी पर मुझे उससे मिलने की कोई उत्सुकता नहीं थी । बीतते समय के साथ ही मेरे अंतर में उसकी छवि अमिट होती गयी, तमाम व्यस्तताओं के बीच भी मै उसके स्नेह को नहीं भूल सकी हूँ। अनेक चिर-परिचितों के चेहरों के बीच उसका चेहरा मै आज भी विस्मृत नहीं कर सकी हूँ।
Sunday, November 14, 2010
Friday, October 29, 2010
प्रतिदिन समाचारों को पढ़ते -सुनते हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि व्यक्ति कितना संवेदनहीन होता जा रहा है और ये प्रक्रिया अनवरत चालू है | स्वास्थ्य की ही बात करें तो एक ही दिन में अनेक ख़बरें सुनाई और दिखाई देतीं हैं जैसे दूध में डिटर्जेंट ,सब्जियों-फलों में रसायनों का स्तेमाल, मिड डे मील निम्न स्तर का होना, दवाओं का नकली व्यापार और भी ऐसा कुछ जो हम सब जानते होंगे या सोच भी नहीं सकते होंगे | गरीबों और पिछड़ों के स्वास्थ्य और शिक्षा की बातें करने वालों को ये भी महसूस करना होगा कि दाल का फ्लेवर मिले पानी के साथ सब्ज़ी के स्थान पर चटनी परोसकर स्कूलों में विद्यार्थी नहीं बटोरे जा सकते | पानी में हाथ डालकर दाल खोजते इन बच्चों को आप उनके बराबर कैसे खड़ा कर पाएँगे जिनकी भूख से पहले ही भोजन की मेज सजी होती है | अक्सर खेलों के स्तर की चर्चा होती है, उसके लिए मिलने वाली सुविधाओं की बात होती है पर हम मिलावटी दूध, प्रदूषित फल सब्जियां खिलाकर आने वाली नस्ल को कैसे होनहार बना पाएँगे! देश और समाज के अनेक मुद्दों के अलावा विभिन्न टैक्सों में बंटे आम आदमी की संवेदनशीलता यदि कम हुई है, उसके रिश्तों में कटुता बढ़ी है तो कोई आश्चर्य नहीं, वैदिक काल से हम जानते हैं कि हमारा आहार-विहार हमारी सोच को प्रभावित करता है |
Monday, September 6, 2010
अनुभूति
पढ़ने के साथ ही मुझे लिखना भी अच्छा लगता रहा है | किंतु बहुत दिनों से मैंने कुछ खास नहीं लिखा, मेरे बहुत से विचार पन्नों ने सहेज कर रक्खे है और उससे भी ज्यादा कोरी कल्पनाओ तक सीमित रहे |ब्लॉग के जरिए दूसरों को पढ़ने और स्वयं के विचार व्यक्त करने का अवसर सुखद है |
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