जब मै छोटी थी और अल्लाहाबाद के एक स्कूल में पढ़ रही थी। तब भी मेरे दोस्तों की संख्या कम थी, मेरे लिए दोस्ती का मतलब उनसे बातें कर लेने तक ही सीमित था किन्तु मेरे साथ पढ़ने वाली वर्षा के लिए दोस्ती वो वस्तु थी जिसे वह बांधकर रख लेना चाहती थी , खाने की छुट्टी में वह चाट के ठेले तक मुझे अक्सर ले ही जाती मुझे यह कभी अच्छा नहीं लगता था, कक्षा में हमारे बैठने कि जगहें अलग-अलग थी पर वो जब-तब मुझे अपने ही पास बैठाती उसके अपने प्रति उसके लगाव के कारण मै अधिक विरोध नहीं कर पाती थी, उसके बुलाने पर एक बार मै उसके घर भी गयी थी वहां उसका छोटा भाई भी मिला , मुझे वहां भी अच्छा नहीं लग रहा था । तीन-चार वर्षो के बाद मै दूसरे स्कूल में चली गयी, एक बार वो मेरी अनुपस्थिति में घर आकर माँ से मिल गयी थी पर मुझे उससे मिलने की कोई उत्सुकता नहीं थी । बीतते समय के साथ ही मेरे अंतर में उसकी छवि अमिट होती गयी, तमाम व्यस्तताओं के बीच भी मै उसके स्नेह को नहीं भूल सकी हूँ। अनेक चिर-परिचितों के चेहरों के बीच उसका चेहरा मै आज भी विस्मृत नहीं कर सकी हूँ।
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